Maharashtra Politics: महाराष्ट्र की सियासत में एक के बाद एक उलटफेर देखने को मिल रहे हैं। बिहार विधानसभा चुनावों में भाजपा नीत एनडीए की शानदार जीत की खुशी अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि महाराष्ट्र से पार्टी को करारा झटका लग गया। उल्हासनगर से छह प्रमुख पूर्व नगरसेवकों ने भाजपा को अलविदा कह दिया और वे ईknath शिंदे की शिवसेना तथा ओमी कलानी की टीम में शामिल हो गए। यह घटना न केवल महायुति गठबंधन की एकजुटता पर सवाल खड़ी कर रही है, बल्कि आगामी नगर निगम चुनावों से पहले भाजपा की स्थिति को और कमजोर करने वाली साबित हो रही है।

आइए, इस पूरे घटनाक्रम को विस्तार से समझते हैं।
Maharashtra Politics: बिहार की जीत और महाराष्ट्र का तूफान क्या है कनेक्शन?
14 नवंबर 2025 को बिहार विधानसभा चुनावों के नतीजों ने भाजपा समर्थकों में उत्साह की लहर दौड़ा दी। एनडीए
ने 202 सीटें हासिल कर एकतरफा जीत दर्ज की, जिसे पार्टी ने ऐतिहासिक बताया। महाराष्ट्र में भी भाजपा इकाई
इस जीत का जश्न मना रही थी, लेकिन उसी शाम उल्हासनगर से आई खबर ने सबको स्तब्ध कर दिया। छह पूर्व
भाजपा नगरसेवकों ने पार्टी छोड़ दी और वे शिंदे गुट की शिवसेना तथा स्थानीय प्रभावशाली ओमी कलानी की
टीम में शामिल हो गए।
यह स्थानांतरण महज संयोग नहीं लगता। बिहार की जीत के बाद भाजपा की महत्वाकांक्षा बढ़ी है, लेकिन महाराष्ट्र
में गठबंधन साझेदार शिवसेना के साथ तनाव पुराना हो चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह घटना गठबंधन की
आंतरिक कलह को उजागर करती है, जहां हर पार्टी अपने क्षेत्र में विस्तार चाहती है।
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कौन हैं ये छह नेता, जिन्होंने BJP को छोड़ा?
उल्हासनगर, जो कल्याण लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है, हमेशा से सियासी हलचलों का केंद्र रहा है। यहां से भाजपा
के छह प्रमुख चेहरे थे, जो अब विपक्षी खेमे में चले गए। इनमें शामिल हैं:
- किशोर वनवारी और मीना सोंडे: ये दोनों सीधे ईknath शिंदे की शिवसेना में शामिल हुए। वनवारी स्थानीय स्तर पर सक्रिय नेता रहे हैं, जबकि सोंडे महिलाओं के मुद्दों पर मुखर रही हैं।
- जमुनू पुरासवानी, प्रकाश मखीजा, महेश सुकरमानी और चार्ली परवानी: ये चारों ओमी कलानी की टीम (टीओके) में शामिल हो गए, जो शिवसेना का स्थानीय सहयोगी है। पुरासवानी पांच बार के नगरसेवक और पूर्व उपमहापौर हैं। मखीजा चार बार नागरिक स्थायी समिति के अध्यक्ष रहे, जबकि सुकरमानी को महाराष्ट्र साहित्य अकादमी में राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त था। परवानी युवा ब्रिगेड के चेहरा माने जाते हैं।
ये नेता उल्हासनगर में भाजपा के मजबूत स्तंभ थे। उनकी विदाई से पार्टी का स्थानीय आधार कमजोर पड़ गया है,
खासकर जहां शिवसेना का दबदबा रहा है।
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विद्रोह की जड़ें: आंतरिक कलह और विस्तार की होड़
इस स्थानांतरण के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। सबसे बड़ा कारण महायुति के दो प्रमुख सहयोगियों—भाजपा और
शिवसेना—के बीच चल रही आपसी खींचतान है। रविंद्र चव्हाण के महाराष्ट्र भाजपा प्रमुख बनने के बाद पार्टी ने
कल्याण लोकसभा क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की, जो शिंदे परिवार का गढ़ है। इससे शिवसेना
के कई कार्यकर्ता भाजपा में आए, जिसका जवाब शरद पवार के दामाद और सांसद श्रीकांत शिंदे ने इन छह नेताओं
को अपने पाले में खींचकर दिया।
प्रकाश मखीजा ने कहा, “वरिष्ठ भाजपा और सेना नेता एक-दूसरे के खिलाफ काम कर रहे हैं, जिससे हमें यह कदम
उठाना पड़ा।” स्रोतों के मुताबिक, कलानी परिवार का प्रभाव पहले कमजोर हो गया था, जब उनके पांच नगरसेवक
भाजपा में चले गए थे। अब यह काउंटर-अटैक कलानी परिवार के लिए राहत साबित हो रहा है। बिना वरिष्ठ नेताओं
के हस्तक्षेप के यह कलह अन्य क्षेत्रों में फैल सकती है।
उल्हासनगर की राजनीति हमेशा से जटिल रही है। यहां गुजराती और सिंधी समुदाय का प्रभाव है, और गठबंधन की
राजनीति यहां जल्दी बदल जाती है। 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को फायदा हुआ था, लेकिन अब संतुलन
बिगड़ रहा है।
भाजपा पर असर: आगामी चुनावों में चुनौती बढ़ी
यह घटना भाजपा के लिए कल्याण क्षेत्र में सबसे बड़ा झटका है। आगामी नगरीय निकाय चुनावों से पहले यह
स्थानांतरण पार्टी की एकजुटता को चुनौती दे रहा है। महायुति गठबंधन की मजबूती पर सवाल उठ रहे हैं, जबकि
विपक्ष इसे कमजोरी का सबूत बता रहा है। यदि ऐसी घटनाएं बढ़ीं, तो महाराष्ट्र में भाजपा की रणनीति पर पुनर्विचार
जरूरी हो सकता है।
निष्कर्ष: Maharashtra Politics
बिहार की जीत के बाद महाराष्ट्र से भाजपा को मिला यह झटका सियासत की अनिश्चितता को दर्शाता है। छह नेताओं
का शिंदे सेना और कलानी टीम में जाना न केवल स्थानीय स्तर पर पार्टी को कमजोर कर रहा है, बल्कि गठबंधन की
नींव हिला रहा है। राजनीति में वफादारी और महत्वाकांक्षा का टकराव हमेशा से होता रहा है, लेकिन यहां यह महायुति
के भविष्य के लिए खतरे की घंटी बजा रहा है। भाजपा को अब आंतरिक एकता पर फोकस करना होगा, वरना बिहार
जैसी जीतें भी महाराष्ट्र जैसे झटकों से फीकी पड़ सकती हैं। सियासत के इस खेल में जीतने वाला वही होगा, जो
गठबंधन को मजबूत रख सके।





