Delhi Blast जांच: दिल्ली में हाल ही में हुए रेड फोर्ट के पास कार ब्लास्ट की जांच तेज हो रही है। इस घटना के बाद सुरक्षा एजेंसियों की नजर हर संभावित लिंक पर पड़ रही है। हरियाणा की अल-फलाह यूनिवर्सिटी अब जांच के केंद्र में आ गई है, जहां फर्जी दस्तावेजों और धोखाधड़ी के आरोपों में दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गई हैं।

यह खुलासा न केवल यूनिवर्सिटी की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रहा है, बल्कि ब्लास्ट की साजिश से जुड़े संदिग्ध
संबंधों को भी उजागर कर रहा है। आइए, इस मामले की गहराई से पड़ताल करते हैं।
Delhi Blast जांच: क्या हुआ था दिल्ली में?
14 नवंबर 2025 को दिल्ली के चांदनी चौक इलाके में रेड फोर्ट के नजदीक एक कार में विस्फोट हुआ, जिसमें दो लोग
घायल हो गए। शुरुआती जांच में यह IED (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) से जुड़ा पाया गया। नेशनल इन्वेस्टिगेशन
एजेंसी (एनआईए) और दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच ने संयुक्त रूप से जांच शुरू की। प्रारंभिक सुरागों से पता चला कि
ब्लास्ट में शामिल संदिग्धों का संबंध कुछ शैक्षणिक संस्थानों से हो सकता है। इसी कड़ी में अल-फलाह यूनिवर्सिटी का
नाम सामने आया, जो फरीदाबाद में स्थित है।
जांचकर्ताओं को यूनिवर्सिटी से जुड़े एक डॉक्टर, डॉ. जाह्निसार आलम को भी हिरासत में लिया गया। वे पश्चिम बंगाल
के उत्तर दिनाजपुर से हैं और यूनिवर्सिटी से जुड़े बताए जा रहे हैं। यह गिरफ्तारी ब्लास्ट से संभावित लिंक को मजबूत
करती है।
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अल-फलाह यूनिवर्सिटी पर दर्ज दो एफआईआर: आरोप क्या हैं?
दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच ने 15 नवंबर 2025 को यूनिवर्सिटी के खिलाफ दो अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज कीं। पहली
एफआईआर धोखाधड़ी (चीटिंग) के आरोप में है, जबकि दूसरी फर्जी दस्तावेज तैयार करने और गलत मान्यता के दावों
से संबंधित है।
- पहली एफआईआर (धोखाधड़ी के तहत): यूनिवर्सिटी पर छात्रों को फर्जी प्रमाणपत्र जारी करने का आरोप है। जांच में पाया गया कि कई कोर्सेस के लिए गलत जानकारी दी गई, जिससे छात्रों का शोषण हुआ। भारतीय प्रत्यायन परिषद (AIU) ने पहले ही यूनिवर्सिटी को सस्पेंड कर दिया था।
- दूसरी एफआईआर (फॉर्जरी के तहत): यहां फोकस फर्जी मान्यता दावों पर है। यूनिवर्सिटी ने UGC (यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन) से जुड़े दस्तावेजों में हेरफेर का आरोप झेल रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कमरा नंबर 13 से जुड़े कुछ दस्तावेज संदिग्ध पाए गए, जो ब्लास्ट जांच से लिंक हो सकते हैं।
ये एफआईआर IPC की धारा 420 (धोखाधड़ी), 465 (जालसाजी) और अन्य संबंधित धाराओं के तहत दर्ज की गई हैं।
यूनिवर्सिटी के चांसलर का नाम भी एक वित्तीय फॉर्जरी केस में आया है, जिसमें 7.5 करोड़ रुपये के घोटाले का जिक्र है।
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यूनिवर्सिटी का बैकग्राउंड और बढ़ते संदेह
अल-फलाह यूनिवर्सिटी 2019 में स्थापित हुई, जो मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय के छात्रों के लिए है। यह इंजीनियरिंग,
मेडिकल और ह्यूमैनिटीज कोर्सेस ऑफर करती है। लेकिन पिछले कुछ महीनों से इसकी साख पर सवाल उठ रहे हैं।
AIU सस्पेंशन के बाद अब केंद्र सरकार ने इसके सभी रिकॉर्ड्स का फोरेंसिक ऑडिट ऑर्डर किया है।
एन्फोर्समेंट डायरेक्टोरेट (ED) भी मनी ट्रेल की जांच कर रही है। संदेह है कि यूनिवर्सिटी फंडिंग के जरिए कुछ
असामाजिक तत्वों से जुड़ी हो सकती है। ब्लास्ट जांच में ‘रूम 13’ का जिक्र आया है, जहां से संदिग्ध दस्तावेज
बरामद हुए। एजेंसियां अब यूनिवर्सिटी के स्टाफ और छात्रों की गहन पूछताछ कर रही हैं।
यह मामला न केवल सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है, बल्कि शिक्षा क्षेत्र में पारदर्शिता की कमी को भी उजागर
करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी संस्थाओं पर सख्त निगरानी जरूरी है ताकि फर्जीवाड़ा रोका जा सके।
जांच की अगली दिशा: क्या होगा आगे?
एनआईए और दिल्ली पुलिस अब यूनिवर्सिटी के डिजिटल रिकॉर्ड्स, बैंक ट्रांजेक्शन्स और स्टाफ के सोशल मीडिया
प्रोफाइल्स की स्कैनिंग कर रही हैं। फोरेंसिक टीम दस्तावेजों की वैरिफिकेशन में जुटी है। यदि संदिग्ध लिंक साबित
होते हैं, तो बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हो सकती हैं। साथ ही, UGC ने अन्य संस्थानों के लिए अलर्ट जारी किया है।
निष्कर्ष: Delhi Blast जांच
दिल्ली रेड फोर्ट ब्लास्ट की जांच में अल-फलाह यूनिवर्सिटी पर दर्ज दो एफआईआर एक बड़ा मोड़ साबित हो रही हैं।
यह घटना दर्शाती है कि कैसे शैक्षणिक संस्थान सुरक्षा खतरों के केंद्र बन सकते हैं। फर्जीवाड़े के ये आरोप न केवल
यूनिवर्सिटी की छवि को धूमिल कर रहे हैं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र में सुधार की मांग को तेज कर रहे हैं। एजेंसियों को
अब त्वरित कार्रवाई करनी होगी ताकि ऐसी साजिशें जड़ से उखाड़ फेंकी जाएं। नागरिकों को भी सतर्क रहने की
रूरत है, क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा सबकी जिम्मेदारी है।





