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बलिदान दिवस: 24 नवंबर को क्यों मनाते हैं बलिदान दिवस – इतिहास, घटना और श्रद्धांजलि की पूरी जानकारी

On: November 20, 2025 8:35 PM
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बलिदान दिवस
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बलिदान दिवस: हर साल 24 नवंबर को सिख समुदाय गुरु तेग बहादुर शहादत दिवस के रूप में मनाता है। यह दिन सिख धर्म के नौवें गुरु, श्री गुरु तेग बहादुर जी की शहादत की याद में समर्पित है। 1675 में दिल्ली के चांदनी चौक में औरंगजेब के आदेश पर गुरु जी को सार्वजनिक रूप से शीश कटा दिया गया था।

उनका अपराध सिर्फ इतना था कि उन्होंने कश्मीरी पंडितों सहित सभी धर्मों के लोगों की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए

अपनी आवाज उठाई। गुरु तेग बहादुर जी ने सिखा दिया कि दूसरों के अधिकारों के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करना ही

सच्चा धर्म है।

2025 में भी 24 नवंबर को देशभर के गुरुद्वारों में विशेष दीवान सजाए जाएंगे। सुबह प्रभात फेरी, कीर्तन, अरदास और

शाम को गुरुद्वारों को रौशनी से सजाया जाएगा। दिल्ली के शीश गंज गुरुद्वारा और रकाब गंज गुरुद्वारा में लाखों श्रद्धालु

मत्था टेकेंगे।

बलिदान दिवस: गुरु तेग बहादुर जी का संक्षिप्त जीवन परिचय

गुरु तेग बहादुर जी का जन्म 1 अप्रैल 1621 को अमृतसर में हुआ था। उनके पिता छठे गुरु, श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी

थे। बचपन का नाम त्याग मल था। मुगलों से कई युद्ध लड़ने के कारण उन्हें “तेग बहादुर” (तलवार के धनी) कहा गया।

1664 में वे सिखों के नौवें गुरु बने। उन्होंने पूर्वी भारत (बंगाल, असम तक) में व्यापक यात्राएं कीं और सिख धर्म का

प्रचार किया। पटना साहिब, ढाका और असम में कई गुरुद्वारे उनकी यात्रा की याद दिलाते हैं।

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शहादत की घटना – क्या हुआ था 1675 में?

औरंगजेब की नीति थी कि पूरे हिंदुस्तान को इस्लाम कबूल करवाया जाए। 1675 में कश्मीरी पंडितों का एक जत्था

आनंदपुर साहिब पहुंचा और गुरु जी से मदद मांगी। औरंगजेब उन्हें जबरन मुसलमान बना रहा था। गुरु तेग बहादुर

जी ने कहा – “ऐसा न होगा, पहले मेरे सामने आओ”।

#गुरु जी अपने तीन साथियों – भाई मतिदास, भाई सतिदास और भाई दयाला जी के साथ दिल्ली गए। औरंगजेब ने

गुरु जी को तीन विकल्प दिए:

  1. इस्लाम कबूल करो,
  2. कोई चमत्कार दिखाओ,
  3. या मृत्यु स्वीकार करो।

गुरु जी ने किसी भी विकल्प को स्वीकार नहीं किया। पहले भाई दयाला जी को उबलते तेल में डालकर शहीद किया

गया। भाई मतिदास जी को आरे से चीर दिया गया। भाई सतिदास जी को कपास में लपेटकर जिंदा जलाया गया।

इसके बाद 24 नवंबर 1675 को गुरु तेग बहादुर जी का सिर काट दिया गया।

उनके शीश को भाई जेटा जी ने आनंदपुर साहिब लाकर अंतिम संस्कार किया (रकाब गंज गुरुद्वारा) और धड़ को भाई

लक्खी शाह वंजारा ने अपने घर में जलाकर अंतिम संस्कार किया (गुरुद्वारा शीश गंज, दिल्ली)।

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शहादत दिवस कैसे मनाया जाता है?

  • सुबह से गुरुद्वारों में अखंड पाठ शुरू होते हैं।
  • कीर्तन-कथा और शब्द कीर्तन के विशेष दीवान सजे जाते हैं।
  • शाम को गुरुद्वारे रौशन होते हैं, आतिशबाजी होती है।
  • लंगर का विशेष आयोजन होता है।
  • स्कूलों-कॉलेजों में निबंध, भाषण और चित्रकला प्रतियोगिताएं होती हैं।
  • लोग सोशल मीडिया पर #GuruTeghBahadurJi और #ShaheediDiwas के साथ श्रद्धांजलि देते हैं।

गुरु जी का संदेश आज भी प्रासंगिक क्यों?

“न डरूं किसी से, न किसी को डराऊं” – यही गुरु तेग बहादुर जी का जीवन मंत्र था। उन्होंने सिर्फ सिखों नहीं, बल्कि

हिंदू, मुस्लिम, ईसाई – हर धर्म के लोग उनकी शहादत को सम्मान देते हैं। वे “हिंद दी चादर” कहलाए क्योंकि उन्होंने

दूसरे धर्म के लोगों की रक्षा के लिए अपना जीवन कुर्बान कर दिया।

निष्कर्ष

गुरु तेग बहादुर शहादत दिवस सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता, साहस और मानवता की

जीत का प्रतीक है। 350 साल बाद भी उनकी शहादत हमें सिखाती है कि अन्याय के सामने चुप रहना सबसे बड़ा पाप

है। 24 नवंबर को हर भारतीय को गुरु जी को श्रद्धांजलि देनी चाहिए और उनके दिखाए रास्ते पर चलने का संकल्प

लेना चाहिए। उनका बलिदान हमें याद दिलाता है कि सच्चा धर्म वही है जो दूसरों के अधिकारों की रक्षा करे।

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