यूपी में बड़ा फैसला: 17 OBC जातियों को SC में शामिल

Published on: December 30, 2025
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यूपी में बड़ा फैसला: उत्तर प्रदेश में आरक्षण और जाति आधारित नीतियां हमेशा से राजनीतिक चर्चा का हिस्सा रही हैं। साल 2019 में योगी आदित्यनाथ सरकार ने 17 अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) जातियों को अनुसूचित जाति (SC) की सूची में शामिल करने का प्रयास किया, जिससे बड़ा विवाद खड़ा हुआ। यह फैसला सामाजिक न्याय की दिशा में उठाया गया कदम था, लेकिन संवैधानिक प्रावधानों के कारण यह लागू नहीं हो सका। अदालत ने इसे रद्द कर दिया और केंद्र सरकार ने भी स्पष्ट किया कि SC सूची में बदलाव का अधिकार केवल संसद के पास है।

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आज भी ये जातियां OBC कैटेगरी में ही हैं, और इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों के बीच बहस जारी है। इस लेख में हम

इस प्रस्ताव की पृष्ठभूमि, शामिल जातियों की सूची, राजनीतिक प्रतिक्रियाओं और कानूनी स्थिति पर विस्तार से चर्चा

करेंगे।

यूपी में बड़ा फैसला: प्रस्ताव की पृष्ठभूमि और प्रयासों का इतिहास

यह मुद्दा नया नहीं है। पहली बार 2004-2005 में मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी सरकार ने इन जातियों को

SC में शामिल करने की कोशिश की। फिर 2016 में अखिलेश यादव सरकार ने भी आदेश जारी किए। 2019 में भाजपा

सरकार ने जून में निर्देश दिया कि इन जातियों को SC प्रमाणपत्र जारी किए जाएं। सरकार का कहना था कि ये जातियां

सामाजिक-आर्थिक रूप से अति पिछड़ी हैं और उन्हें SC के लाभ जैसे ज्यादा आरक्षण और सुविधाएं मिलनी चाहिए।

ये जातियां मुख्य रूप से नदी किनारे रहने वाली समुदायों से हैं, जो मछली पकड़ना, नाव चलाना, मिट्टी के बर्तन बनाना

जैसे पारंपरिक काम करती हैं। लेकिन संविधान के अनुच्छेद 341 के अनुसार, SC सूची में कोई बदलाव केवल राष्ट्रपति

की अधिसूचना से और संसद के कानून से ही हो सकता है। राज्य सरकार का एकतरफा फैसला अवैध माना गया।

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प्रस्तावित 17 OBC जातियों की सूची

ये वो जातियां हैं जिन्हें SC में शामिल करने का प्रयास किया गया। ये सभी पहले से OBC सूची में हैं:

  1. निषाद
  2. बिंद
  3. मल्लाह
  4. केवट
  5. कश्यप
  6. भर
  7. धीवर
  8. बाथम
  9. मछुआ
  10. प्रजापति (कुम्हार)
  11. राजभर
  12. कहार
  13. पोट्टर (या डिमर)
  14. धीमर
  15. मांझी
  16. तुरहा
  17. गौर

ये जातियां पूर्वी उत्तर प्रदेश और गंगा किनारे के इलाकों में ज्यादा हैं और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं।

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राजनीतिक विवाद और प्रतिक्रियाएं

इस प्रस्ताव ने यूपी की राजनीति में हलचल मचा दी। विपक्ष ने इसे चुनावी लाभ के लिए लिया गया कदम बताया:

बहुजन समाज पार्टी (BSP): मायावती ने इसे असंवैधानिक कहा और चेतावनी दी कि इससे दलितों का आरक्षण

कमजोर होगा।

समाजवादी पार्टी (SP): अखिलेश यादव ने सरकार पर OBC वोट लुभाने का आरोप लगाया, लेकिन दलित हितों

की भी बात की।

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भाजपा और सहयोगी: निषाद पार्टी जैसे सहयोगियों ने समर्थन किया, क्योंकि ये जातियां उनके वोट बैंक का हिस्सा

हैं। सरकार ने इसे पिछड़ों के उत्थान का कदम बताया।

दलित संगठनों ने प्रदर्शन किए और कहा कि SC कोटे में दूसरों का प्रवेश दलितों के हक मार सकता है। यह मुद्दा

विधानसभा चुनावों में भी उठा।

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कानूनी स्थिति और अदालती फैसले

संविधान स्पष्ट है कि SC सूची में बदलाव केंद्र का अधिकार है।

  • 2019 में ही केंद्र ने UP सरकार के आदेश को गलत बताया।
  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सितंबर 2019 में अंतरिम रोक लगाई और फिर 2022 में तीनों सरकारों (2016 और 2019 के) आदेशों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार ऐसा नहीं कर सकती।
  • 2022 के बाद UP सरकार ने केंद्र को प्रस्ताव भेजने की बात कही, लेकिन 2025 तक कोई बदलाव नहीं हुआ है। केंद्र की SC सूची में ये जातियां शामिल नहीं हैं।

वर्तमान में ये जातियां OBC ही हैं और SC लाभ नहीं मिल रहे।

निष्कर्ष

उत्तर प्रदेश में 17 OBC जातियों को SC में शामिल करने का प्रयास सामाजिक न्याय की भावना से प्रेरित था, लेकिन

संवैधानिक सीमाओं और राजनीतिक विरोध के कारण यह सफल नहीं हुआ। इससे पता चलता है कि आरक्षण जैसे

मुद्दों पर केंद्र-राज्य समन्वय और कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है। आज भी पिछड़े समुदायों की उन्नति की जरूरत

है, लेकिन सही तरीके से। उम्मीद है कि भविष्य में ठोस सर्वे और संसदीय प्रक्रिया से ऐसे मुद्दों का समाधान हो।

यह घटना जातिगत समानता की दिशा में सोचने पर मजबूर करती है।

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